Guru Ji

हजारों मंजिलें होंगी, हजारों कारवां होंगे.... निगाहें हम को ढूंढेंगी, न जाने हम कहाँ होंगे.......

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यहाँ मैंने ज़िन्दगी को बहुत पास देखा है

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यहाँ मैंने ज़िन्दगी को बहुत पास देखा है

हर भटकने वाले को यहीं आस-पास देखा है ।

हर मंज़र यहाँ हसीन, पर

हर दिल को उदास देखा है

यह शहर तो है इंसानों का

पर मैंने पत्थरों का अहसास देखा है

यहाँ मैंने ज़िन्दगी को बहुत पास देखा है ।

हर तरफ यहाँ मयखाना ही नज़र आता है

पर हर शय के होठों पर इक ‘भटकती’ प्यास देखा है

यहाँ कौन करता है दिल की बात “सरफ़रोश”

हर जज्बात को यहाँ हताश देखा है

यहाँ मैंने ज़िन्दगी को बहुत पास देखा है ।

लाख दुश्मन हो ज़माने की हवा, लेकिन

हर परिंदे को मिलाता हुआ उसका आकाश देखा है

यहाँ मैंने ज़िन्दगी को बहुत पास देखा है

हर भटकने वाले को यहीं आस-पास देखा है ।

===================================

अक्सर ये टीस सी

उठती है दिल में

कब तलक भटकते रहेंगे

तलाश में अपनी मंजिल की

कब ख़त्म होगी ये भटकन…।

तमाम आशाओं निराशाओं

के बीच भटकती

कब तलक हिचकोले खाती रहेगी

ये जिंदगी…….।

रोज़ नए-नए सपने बनते हैं बिगड़ जाते हैं

इन्हीं बनते-बिगड़ते सपनों के बीच इक

रौशनी सी दिखाई देती है

उम्मीद की

कभी तो मिलेगी मेरी मंज़िल……….



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64 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Gabby के द्वारा
11/07/2016

Hallo Ellen,super, dass jetzt der Responsive Slider jetzt mitunterstützt wird. Allerdings werden bei mir, wenn ich den Shortcode einfüge, links dem dem Slider mehrere Auzil¤hÃungsfezchen angezeigt. Wenn ich den Slider ins Template integriere, dann nicht. Beim Twenty Eleven Thema ist die Anzeige korrekt.Hast Du eine Idee, woran das liegen könnte?DankeFrank

Abhinav Srivastava के द्वारा
05/05/2012

हर मंजर यहाँ हसीं पर हर दिल को उदास देखा है …..बहुत खूब अजय जी ….. ऐसा ही कुछ लिखा था कभी ….. ये दुनिया बेढंगी ऐसी देखो बड़ी निराली है , हर दिल में कुछ ग़म है पर चेहरे पे खुशहाली है ….!

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    05/05/2012

    हार्दिक आभार अभिनव जी . आप भी बहुत सुन्दर लिखते हैं……

sanjay dixit के द्वारा
02/05/2012

मित्रवर अजय जी नमस्कार सर्वप्रथम दैनिक जागरण में रचना प्रकाशित होने पर बधाई जीवन की उलझनों और संभावनाओ को सूक्ष्मता से व्यक्त करती कविता के लिए साधुवाद

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    02/05/2012

    संजय जी नमस्कार आपने मेरी रचना को संज्ञान में लिया , आपका हृदय से धन्यवाद , हार्दिक आभार…… :)

'राही अंजान' के द्वारा
27/04/2012

खूबसूरत पंक्तियाँ अजय जी ! बहुत अच्छा लगा पढ़कर….. . लाख दुश्मन हो ज़माने की हवा, लेकिन हर परिंदे को मिलाता हुआ उसका आकाश देखा है !! :)

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    27/04/2012

    आदरणीय राही जी, सादर हार्दिक अभिनन्दन……स्वागत है……. मेरे इस ब्लॉग पर जो आपका आगमन हुआ . आप को मेरी यह रचना पसंद आई हार्दिक आभार…….

akraktale के द्वारा
26/04/2012

अजय जी नमस्कार, उम्मीद का दिया जलता रहे. बहुत सुन्दर रचना. बधाई.

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    26/04/2012

    आदरणीय रक्ताले साहब, सादर प्रणाम आपका आशीर्वाद यूं ही मिलता रहे। हमारा लिखना सार्थक होता रहे । हार्दिक आभार…..

Jayprakash Mishra के द्वारा
25/04/2012

जिन्दगी को पास से तो अजय जी जैसे रचनाकार ही देख सकते हैं. आभारी हूं.

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    25/04/2012

    नहीं जे पी जी, मेरी दिव्य-दृष्टि इतनी भी तेज़ नहीं है। प्रतिक्रिया के किए हार्दिक धन्यवाद…..

24/04/2012

यहाँ कौन करता है दिल की बात, हर जज्बात को हताश देखा है, पत्थर पिघल गया जिस पुरुषार्थ से, आज उसको निराश देखा है. जो कल तक नहीं थके रास्तों पर, उनको आज मंजिल पर हताश देखा है. बेदखल हो के अपनो से ‘अलीन’ गैरों के पतों पर तलाश देखा है.

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    24/04/2012

    अनिल भाई नमस्कार, यह आपकी ही जुबानी ……..उनके लिए जो आपके चाहने वाले हैं ” गर नहीं ऐब तुझमें, फिर आईना देख कर घबराता क्यूँ है” ? हताश होने की कौनों जरूरत नहीं है हम आप के साथ हैं न…. प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार…..

minujha के द्वारा
24/04/2012

अजय जी जिंदगी के प्रति आपका ये नजरिया सिर्फ आपका नहीं कमोबेश हम सबका है,और मंजिल मिलने  का सपना भी……..,एक गाने की पंक्ति याद आ रही है किसको क्या मिला यहां पर अपनी अपनी किस्मत है अच्छी रचना की बधाई

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    24/04/2012

    आभार मीनू जी

shashibhushan1959 के द्वारा
24/04/2012

आदरणीय अजय जी, सादर ! बहुत अच्छी भावनाएं ! जीवन की भटकन का दर्द ! मंजिल तक पहुँचने की बेचैनी ! छटपटाहट ! बधाई !

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    24/04/2012

    आदरणीय शशिभूषण जी सादर प्रणाम, आपको मेरी यह रचना अच्छी लगी , आपका आशीर्वाद मिला , मेरा लिखना सफल हुआ. ह्रदय से आपका धन्यवाद… हार्दिक आभार….. स्नेह बनाये रखे

कुमार गौरव के द्वारा
24/04/2012

रोज़ नए-नए सपने बनते हैं बिगड़ जाते हैं इन्हीं बनते-बिगड़ते सपनों के बीच इक रौशनी सी दिखाई देती है उम्मीद की कभी तो मिलेगी मेरी मंज़िल………. बहुत बढ़िया आशावादी सोच. बधाई आपको…

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    24/04/2012

    धन्यवाद गौरव जी

rajkamal के द्वारा
23/04/2012

यह शहर तो है इंसानों का पर मैंने पत्थरों का अहसास देखा है प्रिय अजय जी …… सप्रेम नमस्कारम ! बहुत खूब ! लिखा है आपने , कभी मैंने भी लिखा था :- “पत्थरों की चोट क्या होती है हमने तो “फूलों” से ज़ख्म खाए है” पत्थरों की चोट का ज़ख्म तो देर सबेर भर ही जायेगा लेकिन इन कमबख्त फूलों के ज़ख्मो का क्या किया जाए :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    24/04/2012

    आदरणीय गुरुदेव सादर प्रणाम. क्या करेंगे गुरुदेव. इन जख्मों की कोई दवा ही इजाद नहीं हुयी है. ये जख्म कभी-कभी नासूर बन जाया करते हैं. इनको झेलने के सिवा कोई चारा भी तो नहीं है..हा…हा…हा….

Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
23/04/2012

हर मंज़र यहाँ हसीन, पर हर दिल को उदास देखा है यह शहर तो है इंसानों का पर मैंने पत्थरों का अहसास देखा है यहाँ मैंने ज़िन्दगी को बहुत पास देखा है । अजय जी नमस्कार. दिल को छू लेने वाली रचना बहुत सुन्दर. जरा ये पंक्तिया भी देखिये. “ज़िन्दगी जिंदगी जिंदगी ख्वाव है. कोई समझा नहीं ज़िन्दगी नाव है.” “अंकुर”

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    24/04/2012

    बहुत खूब हनीफ भाई, आप वास्तव में बहुत शानदार लिखते हैं. हम तो कभी-कभी शौकिया लिखा करते हैं. प्रोत्साहन एवं प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद्

D33P के द्वारा
23/04/2012

यहाँ मैंने ज़िन्दगी को बहुत पास देखा है हर भटकने वाले को यहीं आस-पास देखा है ।…बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    24/04/2012

    वो मुखातिब भी हैं करीब भी उनको देखें की बात करें…… आभार….. दीप्ती जी जो आपका इस नाचीज को आशीर्वाद मिला. हार्दिक अभिनन्दन एवं स्वागत है… पुनः आभार…….

चन्दन राय के द्वारा
23/04/2012

मित्रवर , दिल के तारों को जैसे छेड़ कर दबी टीस को हवा दे रही है आपकी रचनाये , हर मंज़र यहाँ हसीन, पर हर दिल को उदास देखा है दिल को छू लिया

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    23/04/2012

    चन्दन बाबू, यह आप का बड़प्पन है, नहीं तो हम कहाँ इस योग्य हैं कि किसी के दिल को छू लें.. उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद्….

yogi sarswat के द्वारा
23/04/2012

रोज़ नए-नए सपने बनते हैं बिगड़ जाते हैं इन्हीं बनते-बिगड़ते सपनों के बीच इक रौशनी सी दिखाई देती है उम्मीद की कभी तो मिलेगी मेरी मंज़िल……… अजय जी , हर किसी की एक आवाज होती है ! बहुत सारे लोग इसे व्यक्त नहीं कर पाते ! आप उनकी ही आवाज बनकर अपनी लेखनी ke सहारे इस मंच को भी बेहतरीन रचनायें दे रहे हैं ! बहुत बहुत धन्यवाद ! लिखते रहिये !

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    23/04/2012

    हार्दिक आभार योगी जी, बस आप उत्साहवर्धन और मार्गदर्शन करते रहिए । हम भी कुछ बेहतर करते रहेंगे…..

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
23/04/2012

लाख दुश्मन हो ज़माने की हवा, लेकिन हर परिंदे को मिलाता हुआ उसका आकाश देखा है यहाँ मैंने ज़िन्दगी को बहुत पास देखा है हर भटकने वाले को यहीं आस-पास देख दूबे जी बहुत सुन्दर …काश ये प्यारी हवाएं और तेज हो जाएँ… सब परिंदे मिल जाएँ …एक सुर में गायें..खुले गगन में मुक्त फिरें ..तो आनंद और आये जय श्री राधे भ्रमर ५

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    23/04/2012

    आदरणीय भ्रमर जी, हार्दिक आभार…….। प्रेम के झोंके भी तेज़ होंगे । हम उन्मुक्त गगन में भी उड़ेंगे । एक सुर में गायेंगे । आनंद ही आनंद होगा……..

MAHIMA SHREE के द्वारा
23/04/2012

हर मंज़र यहाँ हसीन, पर हर दिल को उदास देखा है यह शहर तो है इंसानों का पर मैंने पत्थरों का अहसास देखा है वाह वाह वाह …गुरु जी आप तो छा गए … :) बड़े दिनों के बाद .. बहुत खूब … बधाई स्वीकार करें

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    23/04/2012

    महिमा जी आपकी बधाई सहर्ष स्वीकार है….. सब आप लोगों का आशीर्वाद एवं आप सब की छत्र -छाया का असर है. आभार….

rekhafbd के द्वारा
23/04/2012

आदरणीय अजय जी , इन्ही बनते बिगड़ते सपनो के बीच इक रौशनी सी दिखाई देती है उम्मीद की कभी तो मिले गी मेरी मंजिल अति सुंदर कविता ,बधाई

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    23/04/2012

    रेखा जी नमस्कार, प्रतिक्रिया ऐवम प्रोत्साहन के किए धन्यवाद

jalaluddinkhan के द्वारा
23/04/2012

ज़िन्दगी के खट्टे-मीठे अनुभव हमें बहुत कुछ सिखा देते हैं- “कुछ यादें रह जाती हैं, कुछ बातें रह जाती हैं, आँखों में ही जाने; कितनी रातें रह जाती हैं.” अच्छे भावों और गंभीर चिंता लिए हुए सराहनीय कविता है.आपकी ऐसी और रचनाओं की प्रतीक्षा में हूँ.

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    23/04/2012

    खान साहब कोशिश जारी है, आप सब की उम्मीदों पर खरा उतरने का प्रयास करूँगा. प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार…

Khyati Sharma के द्वारा
23/04/2012

“हर तरफ यहाँ मयखाना ही नज़र आता है पर हर शय के होठों पर इक भटकती प्यास को देखा है” बहुत सुंदर कविता, बहुत सुंदर शब्द . मुझे जागरण की अब तक की कविताओं में ये बेहद पसंद आयी. आप ग़ज़ल भी लिखे मुझे उम्मीद है अच्छी ही लिखेंगे.

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    23/04/2012

    ख्याति जी नमस्कार, स्वागत है मेरे इस गरीब खाने में । प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद आपकी उम्मीदों पर खरा उतरने का प्रयास करूंगा

krishnashri के द्वारा
23/04/2012

आदरणीय दुबे जी , सप्रेम नमस्कार , बहुत सुन्दर ,भाव प्रधान अच्छे शब्द संयोजन से युक्त कविता . मंच पर प्रस्तुत करने के लिए बधाई .

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    23/04/2012

    आदरणीय कृष्णा जी सादर प्रणाम आपका आशीर्वाद प्राप्त कर के मैं तो भाव-विह्वल हो गया . प्रोत्साहन और मार्ग-दर्शन का आकांक्षी ………….

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
23/04/2012

बहुत सुन्दर कविता,अजय जी. यहाँ मैंने ज़िन्दगी को बहुत पास देखा है । लाख दुश्मन हो ज़माने की हवा, लेकिन हर परिंदे को मिलाता हुआ उसका आकाश देखा है यहाँ मैंने ज़िन्दगी को बहुत पास देखा है हर भटकने वाले को यहीं आस-पास देखा है क्या खूब पंक्तियाँ है.अति सुन्दर.

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    23/04/2012

    आदरणीय झा साहब नमस्कार, ऐसे ही उत्साहवर्धन और मार्गदर्शन की प्रतीक्षा रहेगी….। आभार……

div81 के द्वारा
23/04/2012

बहुत पास से देखा आपने जिंदगी को बहुत ही खूबसूरत रचना …………………कभी तो मिलेगी मेरी मंजिल …… दोनों ही रचना बहुत बढ़िया है ………… बधाई

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    23/04/2012

    हार्दिक आभार दिव्या जी ।

nishamittal के द्वारा
23/04/2012

बहुत सुन्दर प्रस्तुति ,बधाई अजय जी.रोज़ नए-नए सपने बनते हैं बिगड़ जाते हैं इन्हीं बनते-बिगड़ते सपनों के बीच इक रौशनी सी दिखाई देती है उम्मीद की कभी तो मिलेगी मेरी मंज़िल……….प्रेरक पंक्तियाँ

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    23/04/2012

    हार्दिक आभार निशा जी

vikramjitsingh के द्वारा
23/04/2012

”मंजिलें आतीं रहीं, और मैं यही कहता रहा…. ये मेरी मंजिल नहीं, ये भी मेरी मंजिल नहीं……” सुन्दर रचना अजय जी…..

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    23/04/2012

    उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद विक्रम जी

dineshaastik के द्वारा
23/04/2012

यह शहर तो है इंसानों का पर मैंने पत्थरों का अहसास देखा है उपरोक्त पंक्तियों में सबसे खूबसूरत पंक्ति, बधाई…..

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    23/04/2012

    दिनेश जी नमस्कार, उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
22/04/2012

सपने तो सपने होते हैं | मुश्किल से अपने होते हैं || अच्छी अभिव्यक्ति !! बधाई अजय जी !!

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    23/04/2012

    आदरणीय आचार्य जी, आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली, मेरा लिखना सार्थक हुआ । आभार…..

के द्वारा
22/04/2012

एक-एक कर देरी की रचनाओं को मंच पर लाइए बहुत अच्छी लिखी हैं. शुक्रिया

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    23/04/2012

    आप का भी शुक्रिया

Santosh Kumar के द्वारा
22/04/2012

अजय भाई ,.सादर नमस्ते लाख दुश्मन हो ज़माने की हवा, लेकिन हर परिंदे को मिलाता हुआ उसका आकाश देखा है…वाह वाह इन्हीं बनते-बिगड़ते सपनों के बीच इक रौशनी सी दिखाई देती है उम्मीद की कभी तो मिलेगी मेरी मंज़िल……….बहुत बहुत बधाई +आभार

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    22/04/2012

    सब आप की दुआ है बंधू,,,,,,,संगत का असर है ऐसे ही उत्साह बढ़ाते रहिये…..

ANAND PRAVIN के द्वारा
22/04/2012

अजय भाई, नमस्कार वाह वाह……………..कितनी बार कहूँ…………..पहले सोच लेता हूँ………… शब्द लाजवाब और भाव गंभीर …………जिन्दगी को वास्तव में आपने काफी पास से देखा है लगता है……….. किन्तु कविता तो दोनों बहोत ही सुन्दर है…………..एक के साथ एक फ्री दे रहें है क्या…………….. या ये है डबल डोज़………………….

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    22/04/2012

    प्रवीण भाई नमस्कार आज-कल एक के साथ एक फ्री का ही ज़माना चल रहा है.. यह रचना मार्च 1999 में लिखी थी. लिखकर डायरी में बंद कर दी थी. सोचा आज आप लोगों के सामने हाज़िर कर दूं. उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार…….

    rajkamal के द्वारा
    23/04/2012

    प्रिय आनंद पर्वत जी …… सप्रेम नमस्कारम ! हमारे कालेज में हम एक दर्जन मुश्टंडे अबोध बालको का ग्रुप हुआ करता था जिसमे की आधे एक नजदीकी शहर से आया करते थे ….. (कालेज की पढ़ाई के बाद ) हमारे शहर के हम छह बालको में फूट पड़ गई ….. लेकिन उन दूसरे छह अबोध बालको के हमारे शहर में आने पर हमने कभी भी उनके सामने खुद को अलग -२ प्रदर्शित नहीं किया –चाहे उनके वापिस चले जाने के बाद हम फिर से “चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाए हम छह” गाना गाने लगते थे ….. मेरी इस सच्ची कहानी में जो ट्विस्ट है क्योंकि उसमे अहम नहीं है इसलिए वोह आपको लुभा सकती है ….. लेकिन जिनकी तरफ इशारा किया गया है वोह सभी तरह की आधुनिक बीमारियो से गृस्त है ….. बहुत ही बेहतरीन रचना पर मुबारकबाद :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    23/04/2012

    आदरणीय गुरुदेव, सादर प्रणाम सबसे पहले तो इस छोटे से मिटटी के प्रवीन को पर्वत बनाने के लिए आभार…………… लगता है आपकी समाश्या का निदान नहीं हुआ अभीतक……… आप छः अबोध की बात कह रहें है………….यहाँ एक अबोध जी मुझसे ऐसे रूठे की अब मेरे ब्लॉग पर झाँकने भी नहीं आते …………कहीं आपने ही तो कोई तीर नहीं मारा…………..आपको आपके मित्रो संग धन्यवाद

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    24/04/2012

    आदरणीय गुरुदेव, सादर प्रणाम प्रोत्साहन एवं प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार…. बहुत कुछ सीखना है आपसे. आपकी आधी बातें तो सिर के ऊपर से निकल जाती हैं.


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