Guru Ji

हजारों मंजिलें होंगी, हजारों कारवां होंगे.... निगाहें हम को ढूंढेंगी, न जाने हम कहाँ होंगे.......

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अब हम भी अमीर हो गए हैं......

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अब हम भी अमीर हो गए हैं…….. चौंकिए मत सही कह रहे हैं….. आप सब सोच रहे होंगे कि सौ- दो सौ की दिहाड़ी करने वाला अचानक से अपने आप को अमीर कैसे कहने लगा. लगता है जरुर इसे कोई सपना आया है या फिर गरीबी से तंग आ कर ‘सनक’ गया है…. तो भईया न ही हमको कोई सपना आया है और न ही हम सनके हैं….. जब पहली बार यह दिव्य अहसास हमको हुआ था, तो हम भी आप की तरह ही चौंके थे.
कहाँ हम अपनी गरीबी का रोना रोया करते हैं…… दो वक्त के खाने की व्यवस्था जैसे-तैसे कर पाते हैं….. कपड़ों के बारे में तो सोचना ही मुनासिब नहीं है…. शादी-गौना में नए कपडे बन जाएँ यही बहुत है….तीज-त्यौहार की बात ही छोडिये….. बाबू लोगों के दान से ही अपना काम चलता रहा है…. वैसे भी गरीब आदमी को, शादी-गौना या फिर मरने पर ही नया कपड़ा नसीब होता है….. यह तो ‘परधान’ जी की कृपा रही कि इंदिरा-आवास के रूप में एक छत नसीब हो गयी…. नहीं तो छप्पर में ही जीवन गुजरता रहा है…. घर में कोई ज्यादे बीमार पड़ जाये तो ‘खेत’ या ‘मेहरिया’ के गहने गिरवी रख कर या बाबू लोगों से ‘ब्याज’ पर पैसे ले कर ही ‘दावा-दारू’ का इंतजाम हो पाता है…. बच्चों को प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने की औकात ही नहीं.. पढ़ाने का शौक है तो सरकारी स्कूल में भेज दिया करते हैं…. दूसरा अपना स्वार्थ भी है… चलो इसी बहाने बच्चों को एक वक्त का खाना मिल जाता है. थोडा बहुत बजीफा भी मिल जाता है…कभी सरकार मेहरबान हुयी तो एक-आध कपड़ा-लत्ता भी मिल जाया करता है.. वहां फ़ीस-फास का भी कौनो झंझट नहीं है… हाँ कभी-कभार गुरु जी को दही-तरकारी जरुर से भेज दिया करते हैं….
जीवन तो चल ही रहा है. फिर भी हम अपनी गरीबी से तंग आ ही गए थे. अपने आप को कोसा करते थे. भगवान को भी ‘गरियाते’ थे, काहें हमें गरीब घर में पैदा किये. हम कौन सा बुरा कर्म किये थे……काहें नहीं हमारे पास वह सब कुछ है जो एक सुखी इन्सान को चाहिए….
लेकिन कल हमारी सारी भ्रान्ति टूट गयी…. और इस दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई कि हम भी अमीर हैं…. यह दिव्य ज्ञान हमको मिला हमारे खूबलाल काका से….
हुआ यह कि कल काका बहुत ही प्रसन्नचित्त, हाथ में मिठाई का डिब्बा लिए, जोर-जोर से सबको बुलाते हुए गाँव के बगीचे में पहुंचे… हरे रामेशवा… हे सुगंधिया…… हियाँ आऊ…. सब लोग मिठाई खाओ…हम भी पहुंचे उनके पास… पूछ बैठे काहें काका का बात है कि मिठाई बाँट रहे हो…. नाती हुआ है का….. काका गुर्राए धत ससुरा…. लरिका की मेहरिये नाहीं है और तुम को नाती कि सूझी है…… खली-पीली मजाक किया करते हो….
हम कहे तब काहें मिठाई बाँट रहे हो… कहने लगे, हम अमीर हो गए हैं….. इसी ख़ुशी में मिठाई बाँट रहे हैं…. हम भी सोचने पर मजबूर हो गए कि जो आदमी जीवन भर ‘हथौड़ा‘ चलाता रहा है और लोहा पीटता रहा है वह अचानक से अमीर कैसे हो गया… हम फिर से पूछ बैठे…. का कौनो लाटरी लगी है या फिर कौनो खजाना पाय गए हो… या फिर तुम भी इंटरनॅशनल भिखारियों की ‘जमात’ में शामिल हो गए हो…..
काका फायर….. कहने लगे तुम लोग जीवन भर मूरख के मूरख ही रहोगे….. देश-दुनिया की खबर तो रहती ही नहीं है…. थोडा बहुत पढ़े-लिखे हो, वशिष्ठवा की चाय की दुकान पर जा कर, कभी-कभार अखबार वगैरह पढ़ लिया करो… टी.वी.-रेडिओ पर समाचार देखा-सुना करो……
हम फिर से पूछ बैठे ‘ई समाचार और तुम्हारी अमीरी में’ का सम्बन्ध है…. काका झल्ला के बोले अरे मूरख….. समाचार में आया है कि हमारे दिल्ली वाले बाबू लोग तय किये हैं, “शहर में रहने वाले लोग जिनकी रोज़ की कमाई 29 रुपये है, वे अब गरीबी रेखा पार कर चुके हैं और गाँव में जिनकी रोज़ की कमाई 22 रुपये है, वे अब गरीब नहीं माने जाएंगे.”। तो बताओ हम अमीर हुए कि नहीं... हम तो इसके दुगुना-तिगुना कमाते है.. यह अलग बात है कि हम हमेशा रोते रहते हैं…..
हम भी अपना गुणा-गणित लगाये. लेकिन यह गणित हमारे पल्ले नहीं पड़ा. यह सोच कर संतोष कर लिए कि दिल्ली वाले बाबू लोग हैं, विद्वान-ज्ञानी हैं कुछ सोच कर ही हिसाब बैठाये होंगे….
हमारे हिसाब से तो एक वक्त की सब्जी भी इतने में नहीं हो पाती……
चलते-चलते…….. यह कहानी आप सबकी सुनी हुई है मैं फिर से दुहरा दे रहा हूँ……
एक दिन, एक आदमी, एक चिड़िया-घर को देखने के लिए गया. वहां उसने देखा कि सिर्फ एक गधे को छोड़ कर चिड़िया घर के सभी जानवर बहुत ही प्रसन्न हैं और अपने-अपने अंदाज़ में हंस रहे रहें. उसने वहां के कर्मचारी से पूछा, क्या बात है? कि सारे जानवर हंस रहे है. कर्मचारी ने बताया कि उनके बीच में कोई ऐसी मजेदार बात हुयी है जिससे सभी जानवर हंस रहे है. वह आदमी फिर दूसरे दिन चिड़िया-घर जाता है और देखता है कि सभी जानवर अपने-अपने काम में व्यस्त हैं लेकिन आज गधा जोर-जोर से हंस रहा है. पुनः कर्मचारी से पूछता है कि क्या बात है? आज सारे जानवर शांत हैं लेकिन गधा हंस रहा है. कर्मचारी बताता है, कल जिस घटना पर सारे जानवर हंस रहे थे, वह बात गधे को आज समझ में आयी है. इसीलिए वह आज हंस रहा है…..



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42 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

संतोष पांडेय के द्वारा
01/04/2012

बहुत करारा व्यंग्य है। मजा आ गया। namaskar.jagranjunction.com

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    01/04/2012

    पाण्डेय जी मज़ा तो लिट्टी-चोखा में भी था. प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद्..,.

चन्दन राय के द्वारा
31/03/2012

अजय जी , बहुत ही बढ़िया व्यंग पर मेरी बधाई स्वीकारे

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    31/03/2012

    चन्दन भाई, नमस्कार. आप की बधाई स्वीकार है. परन्तु यह तो बताईये कि आप कहाँ चले गए थे. प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद्.

sanjay dixit के द्वारा
31/03/2012

सटीक और प्रासंगिक व्यंग्य अजय जी ,बहुत अच्छा लिखा है

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    31/03/2012

    पुनः. उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद्.

sanjay dixit के द्वारा
31/03/2012

सटीक व्यंग्य अजय जी ,बहुत अच्छा लिखा है आपने

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    31/03/2012

    उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद्.

anupammishra के द्वारा
30/03/2012

अद्भुत सिर्फ इतना ही….

Dolly Srivastava के द्वारा
30/03/2012

अजय जी बहुत खूब कहा है आपने, बहुत ही सटीक व्यंग्य…………

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    30/03/2012

    डॉली जी स्वागत है आपका. प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद्. आभार…

Bhupesh Kumar Rai के द्वारा
29/03/2012

अजय जी! सुन्दर व्यंग्य. गरीबी हटाने के इस नायाब सरकारी तरीके की खूब छिक्कल उधेड़ी है आपने,एकदम देशी में.बधाई!

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    29/03/2012

    आदरणीय भूपेश जी, जब हम स्वयं ही देशी हैं तो अंदाज़ भी देशी ही रहेगा. प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद्. आभार…

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
29/03/2012

बहुत सुन्दर आलेख! अजय जी.हँसी हँसी में गहरी बात कही है.

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    29/03/2012

    आदरणीय झा साहब सादर प्रणाम, प्रतिक्रिया एवं प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद्. हार्दिक आभार….

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
28/03/2012

स्नेही अजय जी, सादर ठीक बतिया कैइलू , पर ई बतावा की हमका कब हँसना है. सुन्दर प्रस्तुति, बधाई.

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    29/03/2012

    आदरणीय प्रदीप जी, सादर प्रणाम. क्या बात करतें है? आप भी. कहीं शिष्य अपने गुरु को ज्ञान देता है. फिर भी बता ही देता हूँ. आपको और हमको सदैव ही हंसते- मुस्कराते रहना है. अब चाहें बात पल्ले पड़े या न पड़े. आप तो वैसे भी कबीरपंथी है. हंसते-मुस्कराते रहना ही जीवन का ध्येय है….. आशीर्वाद मिला. आभार…..

akraktale के द्वारा
28/03/2012

अजय जी नमस्कार, सरल शब्दों में सुन्दर व्यंग. २९ रुपये से ज्यादा वाले अमीर. भैया ये भी बताना कहीं सायकल रखने वाले को इनकम टैक्स तो नहीं देना पडेगा.बधाई.

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    29/03/2012

    रक्ताले साहब नमस्कार, प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद्. अब तो साईकिल का ही ज़माना है, साईकिल वाले टेबलेट, लैपटॉप बाँट रहें हैं तो जाहिर सी बात है इनकम टैक्स भी देना पड़ेगा. साईकिल क्या, रिक्शेवालों, पैदल वालों भी टैक्स लगेगा. हमारे बाबू लोगों की रोजी-रोटी का सवाल है. वसूलेंगे नहीं तो अरबों डकारेंगे कैसे. आभार….

rekhafbd के द्वारा
28/03/2012

अजय जी ,बहुत ही बढ़िया व्यंग ,बधाई |

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    29/03/2012

    प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद…. रेखा जी.

Santosh Kumar के द्वारा
28/03/2012

गुरु जी ,.अमीर हो गए फिर हँसते काहे नहीं हैं ,..फोटुआ उदासी वाली चिपकाई है ,..ये निकम्मे नालायक लोग पता नहीं कितने जूते खाकर जायेंगे ,.बढ़िया कटाक्ष .बहुत बधाई

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    28/03/2012

    संतोष भईया, अब जा के तो अमीर हुयें हैं. सीरत बदलने दीजिये सूरत भी बदल जाएगी. बहुत ही अच्छा लगा जो आप मेरे दर पे आये. हार्दिक आभार…..

yamunapathak के द्वारा
28/03/2012

आपकी शैली पसंद आयी,व्यवस्था की सच्चाई आपने हँसते-हँसते लोगों के समक्ष रख दिया.

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    28/03/2012

    यमुना जी स्वागत है आपका……. हंसना-हँसाना ही जीवन है बाकी सब बेकार…..

yogi sarswat के द्वारा
28/03/2012

अजय जी नमस्कार ! आपकी लेखन शैली गज़ब की है ! गंभूर से गंभीर बात को व्यंग्य के रूप में लिखना बड़े कौशल का काम है और निश्चित ही बड़ी योग्यता का भी ! आपमें वो सारे गुण दिखाई देते हैं ! लेकिन एक बात और कहना चाहता हूँ, आपकी लेखन शैली , संतोष जी की शैली से बहुत मिलती है ! लेकिन दोनो ही उत्कृष्ट हैं ! बहुत बढ़िया व्यंग्य !

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    28/03/2012

    आप भी क्या बात करते हैं योगी भाई. यह तो आप सब का प्रोत्साहन है जो हम कुछ लिख जाते हैं. नहीं तो कहाँ हम और कहाँ आप. यह आपका बड़प्पन है की आप ने मुझे मान दिया… हम भी मुरख-मंच के ही एक सदस्य है तो जाहिर सी बात है की हममें और संतोष भईया में थोड़ी बहुत समानता होगी ही. लेकिन संतोष भईया और हममें कोई तुलना नहीं है. संतोष भईया बहुत ही विद्वान हैं, ज्ञानी हैं. उत्साह-वर्धन के लिए धन्यवाद्…….

MAHIMA SHREE के द्वारा
28/03/2012

गुरु जी , नमस्कार क्या बात है…बहुत सधे शब्दों में बड़ी ही सरलता से आपने हमारे आर्थिक विषयो के विद्वान आदरणीय प्रधानमंत्री के नेत्रित्व में चल रही सरकार द्वारा जारी किये गए..गरीबी और अमीरी की सीमा पर जारी किये गए विश्लेषण का करार व्यंग किया आपने ….आपको मेरा …बहुत-२ हार्दिक बधाई ….साभार..

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    28/03/2012

    सीधे-सरल आदमी हैं. इसीलिए बिना लाग-लपेट के अपनी बात कह जाते हैं. प्रोत्साहन एवं प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद्.

minujha के द्वारा
28/03/2012

 आपका अपनी बात कहने का तरीका बहुत लाजवाब है अजय जी,एक अच्छे व्यंग की बधाई 

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    28/03/2012

    मीनू जी, प्रोत्साहन एवं प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद्.

Rajesh Dubey के द्वारा
28/03/2012

बहुत सुन्दर व्यंग, व्यवस्था पर चोट करती हुई. कल जिस बात पर सारे जानवर हँस रहे थे, वो आज गधे को समझ आई है. बहुत सुन्दर.

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    28/03/2012

    धन्यवाद् राजेश जी. यह व्यवस्था ही कुछ ऐसी है, जिस पर चोट पर चोट करते जाइये,परिवर्तित कुछ भी नहीं होना है.

alkargupta1 के द्वारा
28/03/2012

बहुत सुन्दर तीक्ष्ण व्यंग्य किया है अजय जी .

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    28/03/2012

    धन्यवाद् अलका जी.

nishamittal के द्वारा
28/03/2012

बहुत करार व्यंग्य अजय जी.

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    28/03/2012

    आदरणीया निशा जी, सादर. प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद्.

28/03/2012

बहुत सुन्दर व्यंग्य, बहुत ही सुन्दर व्यंग्य……. अजय भैया.हम आपके इसी अदा के तो कायल है……बहुत खूब.

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    28/03/2012

    अनिल भईया धन्यवाद्, अदा तो अपनी निराली है….लेकिन जीवन खाली-खाली है……. कहने को तो एक अदद घरवाली है….ससुराल में नहीं कोई साली है…… आभार…..

dineshaastik के द्वारा
28/03/2012

दोस्त खुद को खुश रखने के लिये ख्याल अच्छा है, एक वाक्य कहके हमें अमीर बना दिया, हमारी सरकार का कमाल अच्छा है, क्या व्यवस्था परिवर्तन की आप नहीं सोचते, उत्तर मिले न मिले, सवाल अच्छा है।

    ajaydubeydeoria के द्वारा
    28/03/2012

    दिनेश जी ख्यालों में जीना है…ख्यालों में मरना है… ख्याल करते-करते शेख-चिल्ली बन गए…….. सरकार हमेशा ही कमाल करती है. व्यवस्था परिवर्तन की सोच कर अपना दिमाग ख़राब क्यों करना ? हमारे आका बैठे हुए हैं सोचने के लिए…… ए. सी. कमरों में बैठ कर सोचते हैं, इसलिए हम से अच्छा ही सोचेंगे. जीवन में सिर्फ सवाल ही सवाल हैं, उत्तर कहाँ है…..उत्तर तलाशते-तलाशते आदमी बूढ़ा हो जाता है फिर भी उत्तर नहीं मिलता.. प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार…..


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